Who was Rani Durgavati: रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 ई. को प्रसिद्ध चंदेल सम्राट कीरत राय के परिवार में हुआ था. उनका जन्म कालंजर (बांदा, यूपी) के किले में हुआ था. भारतीय इतिहास में चंदेल राजवंश अपने बहादुर राजा विद्याधर के लिए प्रसिद्ध है जिन्होंने महमूद गजनवी के आक्रमणों को विफल कर दिया था. रानी दुर्गावती की उपलब्धियों ने साहस और कला के संरक्षण की उनकी पैतृक परंपरा की महिमा को और बढ़ाया.

यह भी पढ़ें: कौन थे महर्षि वेदव्यास? जिनकी जयंती पर मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा

विवाह के बाद जल्दी ही पति का गया था निधन (Who was Rani Durgavati)

उन्होंने बचपन से ही घुड़सवारी, तलवारबाजी और तीरंदाजी जैसी कलाओं की ज्ञान ली थी. रानी दुर्गावती का जिक्र अकबरनामा में भी है जिसमें कहा गया है कि वह तीर और बंदूक चलाने में माहिर थीं. मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्र में रहने वाले गोंड वंशजों के 4 राज्यों – गढ़मंडला, देवगढ़, चांदा और खेरला में से एक गढ़मंडला पर दुर्गावती के पति दलपत शाह का अधिकार था. दुर्भाग्यवश रानी दुर्गावती से विवाह के मात्र 7 वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह की मृत्यु हो गयी.

यह भी पढ़ें: कौन थे महात्मा ज्योतिराव फुले? जानें समाज के लिए उन्होंने क्या-क्या किया

पति की निधन के बाद संभाला शासन

पति की मृत्यु के समय दुर्गावती के पुत्र नारायण केवल 5 वर्ष का था. अत: रानी ने गढ़मंडला का शासन अपने हाथ में ले लिया. उनके राज्य का केंद्र वर्तमान जबलपुर था. रानी ने इस क्षेत्र पर 16 वर्षों तक शासन किया और एक कुशल प्रशासक के रूप में अपनी प्रतिष्ठा बनाई.

यह भी पढ़ें: Who was CV Raman: कौन थे सीवी रमन? कब मिला था नोबले प्राइज और क्या है उनका पूरा नाम

पहले हमले में हुई थी रानी की जीत

अकबर की सेना द्वारा गोंडवाना पर आक्रमण के समय दुर्गावती अपने पुत्र नारायण के साथ घोड़े पर सवार होकर तलवार से शत्रुओं पर टूट पड़ीं. उनका साहस देखकर मुगल सेना में भगदड़ मच गई. इस हार से घबराकर आसिफ खान ने रानी के पास शांति का प्रस्ताव भेजा, लेकिन रानी ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. लेकिन आसिफ खान ने कुछ दिनों के बाद उस पर दूसरी बार हमला किया और फिर उसे मार डाला.

तीसरी बार आसिफ खान ने दोगुनी ताकत से हमला किया. इस युद्ध में रानी के वीर पुत्र वीर नारायण ने सैकड़ों सैनिकों को मारकर वीरगति प्राप्त की. 24 जून 1564 को हुए हमले में रानी ने केवल 300 सैनिकों के साथ सैकड़ों मुगल सैनिकों को मार डाला और बहादुरी से लड़ रही थी कि अचानक एक तीर आया और उनकी आंख में लगा, लेकिन उन्होंने अपनी खंजर को दफन कर दिया और खुद को दुश्मनों के हाथों में जिंदा पकड़ने नहीं दिया.