वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Mandir) से सटी हुई ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi Masjid) पूरे देश का आकर्षण बनी हुई है. वाराणसी की सिविल कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद में मां श्रृंगार गौरी स्थल के वीडियो सर्वे का आदेश दिया था. अब मुस्लिम पक्ष ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने वाले संगठन अंजुमन इंतेज़ामिया मस्जिद की प्रबंधन समिति का मुख्य तर्क ये है कि वाराणसी कोर्ट का आदेश ‘प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट’ (Places of Worship Act 1991) का उल्लंघन है. बता दें कि वाराणसी सिविल कोर्ट के आदेश को इलाहबाद हाई कोर्ट ने 21 अप्रैल को बरकरार रखा था.  

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ज्ञानवापी मस्जिद का वीडियो सर्वे 16 मई को पूरा हो चुका है. मामले में हिंदू पक्ष ने दावा किया है कि सर्वे के दौरान मस्जिद परिसर में एक तलाब के अंदर ‘शिवलिंग’ पाया गया है. हालांकि, मुस्लिम पक्ष ने इस दावे को खारिज कर दिया और कहा कि यह केवल एक फव्वारा है. 

काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के तीन दिवसीय सर्वे की रिपोर्ट मंगलवार को वाराणसी की सिविल कोर्ट में पेश की जाएगी. सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष ने याचिका दायर की है, जिसमें सर्वे पर रोक लगाने और उसकी रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं करने का आदेश देने की मांग की है. आइए जान लेते हैं कि ‘प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट’ है क्या, मुस्लिम पक्ष जिसकी शरण ले रहा है.  

‘प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट’ या ‘पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991’ क्या है? 

‘पूजा स्थल अधिनियम 1991’ की धारा 4 (1) में कहा गया है, “कोई भी धार्मिक स्थल 15 अगस्त 1947 को जिस स्थिति में था और जिस समुदाय का था, वो भविष्य में भी उसी समुदाय का रहेगा.” इस अधिनियम को 11 जुलाई 1991 को नरसिम्हा राव सरकार द्वारा लागू किया गया था. 

1990 में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद को लेकर विवाद बढ़ा तो केंद्र सरकार को ये डर सताने लगा कि इस तरह का मामला देश के अलग-अलग धार्मिक स्थलों को लेकर भी आएगा. ऐसे में  ‘पूजा स्थल अधिनियम 1991’ अपने स्वरूप में आया. अयोध्या का मामला उस समय कोर्ट में था, ऐसे में उसे इस अधिनियम से बाहर रखा गया.   

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बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या राम जन्भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर अपने फैसले में 1991 के ‘पूजा स्थल अधिनियम’ का हवाला देते हुए कहा था कि यह कानून 15 अगस्त 1947 को सार्वजनिक पूजा स्थलों का जो धार्मिक चरित्र था, उसको उसी स्वरूप में बनाए रखने और उनमें बदलाव के खिलाफ गारंटी देता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कानून हर एक धार्मिक समुदाय को यह आश्वासन देता है कि उनके धार्मिक स्थलों का संरक्षण होगा और उनका चरित्र नहीं बदला जाएगा.

बता दें कि प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट को खत्म किए जाने की मांग भी जोरों पर है. बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने एक जनहित याचिका में इतिहास की गलतियों को सुधारने के लिए इस अधिनियम को खत्म करने की मांग की है. उपाध्याय ने प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 को मनमाना और गैर संवैधानिक बताया है.  

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