साहित्य को गहरा बनाने में महिला लेखिकाओं का एक बड़ा योगदान रहा है. वैसे तो भारत की जमीन पर कई ऐसी महिला लेखिका हुई हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से परचम लहराया है. हम 5 ऐसी ही लेखिकाओं का जिक्र करेंगें, जिनके काम से भारत में साहित्य ऊंचे मुकाम पर पहुंचा है-

सावित्री बाई फुले

इनको आधुनिक भारत के पहले वंश की फेमिनिस्ट के तौर पर जाना जाता है. सावित्री बाई ने अपने पति ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर ‘जातिवाद’ का पुरजोर विरोध किया. सावित्री बाई समाज सुधारक के साथ-साथ एक बेहतरीन कावित्री भी थी. उन्होंने अपने समय के विभिन्न प्रकार के भेदभावों को अपनी कविताओं में लिखा है. उनकी कविताओं की रचना उनके मरने के बाद प्रकाशित हुई, जिनमें से ‘काव्य फुले’ (1934) और ‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’ (1984) बहुत प्रख्यात हैं. उनकी कविताएं उस समय के समाज का आईना है.

अमृता प्रीतम

अमृता कौर का जन्म सन 1919 में गुजरनवाला, पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ. सन 1935 में अमृता का विवाह प्रीतम से हुआ और तब से उन्होंने अपना नाम अमृता प्रीतम ही रखा, हालांकि 1960 में दोनों एक दूसरे से अलग हो गए. अमृता पंजाबी भाषा की सबसे प्रख्यात महिला लेखिका हैं. अमृता हिंदी और पंजाबी दोनों भाषाओं में लिखा करती थीं. अपने जीवनकाल में अमृता ने 100 से अधिक किताबें लिखी जिनमें से “अज अक्खां वारिस शाह नू” और ‘पिंजर’ बहुत प्रख्यात है. इन किताबों में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दुख, दर्द और नाउम्मीदी दर्ज है. अमृता को ‘पिंजर’ लिखने की प्रेरणा खुद के ही अनुभव से मिली, जो कि उन्होंने विभाजन के समय दोनों मुल्कों की महिलाओं की स्थितियों को देखकर लिखा. अमृता को 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1969 में पद्मश्री और 2004 में पद्म विभूषण से नवाजा गया.

अरुंधति रॉय

अरुंधति रॉय का जन्म सन 1964 में शिलांग (मेघालय) में हुआ. जब अरुंधति 2 साल की थी तो उनके माता-पिता का तलाक हो गया और वो अपनी मां और भाई के साथ अपने ननिहाल केरल आ गईं. केरल और तमिलनाडु दोनों ही जगह अरुंधति का बचपन बीता. अरुंधति एक विश्व प्रख्यात लेखिका होने के साथ-साथ मानव अधिकार एक्टिविस्ट भी हैं. अरुंधति की किताब ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ को मैन बुकर प्राइज से 1997 में नवाजा गया. अरुंधति आमतौर पर काल्पनिक रचना लिखती हैं पर 1997 के बाद से इन्होंने कई अकाल्पनिक किताबों की रचना की. जिनमें अमेरिका की ईरान और अफगानिस्तान में दखलंदाजी और भारत के न्यूक्लियर टेस्ट की निंदा जैसे मुद्दे शामिल थे.

अनीता देसाई

अनीता देसाई का जन्म सन 1937 में मसूरी (उत्तराखंड) में हुआ था. दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी करने वाली अनीता ने साहित्य के जगत में अपनी एक बड़ी पहचान बनाई. अनीता आमतौर पर काल्पनिक लघु कहानियां, उपन्यास और बच्चों के लिए कहानियां लिखती रही हैं. अनीता की लेखनी 3 बार ‘बुकर्स पुरस्कार’ के लिए नामंकित हुई है. 2007 में अनीता को साहित्य अकादमी पुरस्कार और 2014 में पद्म विभूषण से नवाजा गया. अनीता हिंदी अंग्रेजी के अलावा जर्मन, उर्दू और बंगाली भाषा की जानकार हैं. इनकी बच्चों के लिए किताब “द विलेज बाए द सी” (1982) को ‘गार्डियन चिल्ड्रन फिक्शन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया. अनीता की रचना ‘द कस्टडी’ का रूपांतरण मर्चेंट आइवरी प्रोडक्शन द्वारा एक फ़िल्म के रूप में भी किया गया है.

किरण देसाई

किरण का जन्म नई दिल्ली में हुआ और 14 साल तक उनका बचपन पुणे और मुंबई में बीता. किरण उसके बाद अपनी मां (अनीता देसाई) के साथ इंग्लैंड चली गईं और बाद में वहां से उन्होंने क्रिएटिव राइटिंग की पढ़ाई भी की. किरण बहुत प्रख्यात लेखिका हैं और 2006 में उन्हें मैन बुकर्स प्राइज से भी सम्मानित किया गया. ‘द इनहेरिटेंस ऑफ लॉस’ इनकी वो किताब है, जिसको विश्व भर में सराहा गया. विश्व के प्रचलित काल्पनिक लेखक जैसे कि सलमान रुश्दी ने भी किरण की लेखनी को सराहा है.